Cloud Seeding in Delhi: दिल्ली में हुई प्रदूषण घटाने की नई कोशिश
Cloud Seeding in Delhi : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मंगलवार को प्रदूषण से निपटने के लिए एक अहम प्रयोग किया गया। पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने पुष्टि की कि दिल्ली में क्लाउड सीडिंग के दूसरे चरण के तहत तीन ट्रायल किए गए। इन ट्रायल्स का उद्देश्य कृत्रिम वर्षा के जरिए हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों को कम करना और वायु गुणवत्ता में सुधार लाना है।
सिरसा ने बताया कि इन ट्रायल्स के परिणाम जल्द ही आईआईटी कानपुर द्वारा जारी किए जाएंगे। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक वीडियो साझा करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया आईआईटी कानपुर की टीम ने सेसना एयरक्राफ़्ट के माध्यम से की।
कहां-कहां हुई सीडिंग:
मंत्री के मुताबिक एयरक्राफ़्ट मेरठ की दिशा से दिल्ली में दाख़िल हुआ और इस दौरान खेकड़ा, बुराड़ी, नॉर्थ करोल बाग़, मयूर विहार, सादकपुर और भोजपुर जैसे इलाक़ों में क्लाउड सीडिंग की गई।
इस प्रक्रिया में आठ फ़्लेयर्स का इस्तेमाल किया गया। हर फ्लेयर का वज़न करीब 2 से 2.5 किलो था, जो लगभग 2 से ढाई मिनट तक सक्रिय रहा। इनके माध्यम से बादलों में रासायनिक मिश्रण छोड़ा गया। सिरसा ने बताया कि इस दौरान वातावरण में 15 से 20 प्रतिशत ह्यूमिडिटी पाई गई, जिससे हल्की वर्षा की संभावना बनी। पूरी प्रक्रिया लगभग आधा घंटा चली।
सफल रहा तो फरवरी तक योजना जारी रहेगी
सिरसा ने कहा,“अगर यह ट्रायल सफल रहता है, तो फरवरी तक के लिए दिल्ली में क्लाउड सीडिंग की योजना को आगे बढ़ाया जाएगा। हमारा लक्ष्य कृत्रिम वर्षा के ज़रिए प्रदूषण के स्तर को कम करना है।”
उन्होंने बताया कि विमान मेरठ पहुंच चुका है और वहीं से इस ट्रायल के दूसरे और तीसरे चरण की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी।
आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों का मानना है कि क्लाउड सीडिंग के बाद 15 मिनट से 4 घंटे के भीतर हल्की बारिश हो सकती है, हालांकि नमी की कमी के कारण यह बड़े पैमाने पर नहीं होगी।
राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज़
इस बीच, आम आदमी पार्टी ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने व्यंग्य करते हुए कहा कि
“बीजेपी सरकार और उनके मंत्री अब इंद्र देवता का भी क्रेडिट खा जाएंगे। कल छठ पर हल्की बारिश हुई थी, अब अगर आज बारिश होगी तो कहेंगे हमने कराई है।”
उन्होंने आगे कहा कि सरकार के पास कौन सा “यंत्र, मंत्र और तंत्र” है जो यह साबित कर सके कि बारिश प्राकृतिक है या कृत्रिम।
क्या है क्लाउड सीडिंग?
‘क्लाउड सीडिंग’ दो शब्दों से बना है—क्लाउड (बादल) और सीडिंग (बीज बोना)।
इस प्रक्रिया में बादलों में कृत्रिम रूप से ऐसे रासायनिक पदार्थ छोड़े जाते हैं जो पानी की बूंदों को एकत्र कर वर्षा का रूप देते हैं।
इसके लिए आम तौर पर सिल्वर आयोडाइड, पोटैशियम क्लोराइड और सोडियम क्लोराइड जैसे तत्वों का उपयोग किया जाता है। जब इन्हें विमान या ड्रोन की मदद से बादलों में छोड़ा जाता है, तो ये पानी की सूक्ष्म बूंदों को जमने में मदद करते हैं और अंततः बारिश की बूंदों में परिवर्तित हो जाते हैं।
क्लाउड सीडिंग का इतिहास
क्लाउड सीडिंग की अवधारणा 1940 के दशक में अमेरिकी वैज्ञानिक विंसेंट जे. शेफ़र ने विकसित की थी।
तब से लेकर अब तक दुनिया के कई देशों — जैसे अमेरिका, चीन, यूएई, और इज़राइल — में इस तकनीक का इस्तेमाल सूखे की स्थिति से निपटने या प्रदूषण घटाने के लिए किया जा चुका है।
आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर एस.एन. त्रिपाठी बताते हैं कि क्लाउड सीडिंग तभी संभव है जब आसमान में उचित बादल मौजूद हों।
“सबसे पहले बादलों की ऊंचाई, तापमान और नमी का अध्ययन किया जाता है। उसके बाद सही ऊंचाई पर साल्ट या केमिकल का मिश्रण डाला जाता है, जो बादलों में माइक्रो-प्रोसेस को सक्रिय करता है। इससे बारिश के कण तेजी से बनते हैं और वर्षा होती है।”
नई तकनीक: इलेक्ट्रिक शॉक से बारिश
वैज्ञानिक अब ड्रोन तकनीक के ज़रिए बादलों को इलेक्ट्रिक शॉक देकर भी बारिश कराने के प्रयोग कर रहे हैं। इस तकनीक में बादलों के अंदर चार्ज असंतुलन पैदा किया जाता है, जिससे बूंदें तेज़ी से आपस में जुड़कर वर्षा का रूप लेती हैं।
