New Delhi | Congress पार्टी में आंतरिक समीकरणों और नेतृत्व के भीतर बढ़ते मतभेदों को एक बार फिर हवा मिली, जब वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर राहुल गांधी की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठक में शामिल नहीं हुए। इस अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में नए सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या यह महज़ एक संयोग था या पार्टी के भीतर किसी गहरी असहमति का संकेत? पार्टी सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों के मत अलग-अलग हैं, लेकिन इस घटना ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को फिर सुर्खियों में ला दिया है।
बैठक का आयोजन आगामी चुनावी रणनीति, संगठनात्मक पुनर्गठन और राज्य इकाइयों के बीच बेहतर तालमेल पर चर्चा के लिए किया गया था। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने इसमें भाग लिया, लेकिन शशि थरूर के न पहुंचने पर चर्चा का केंद्र अचानक बदल गया। कई नेताओं ने इसे सामान्य घटना बताया, जबकि कुछ का कहना है कि थरूर की अनुपस्थिति योजनाबद्ध थी और इसके पीछे राजनीतिक संकेत छिपे हुए हैं।
सूत्रों के अनुसार, शशि थरूर को बैठक की जानकारी पहले से दी गई थी, लेकिन उन्होंने “पूर्व निर्धारित कार्यक्रम” का हवाला देते हुए इसमें शामिल होने में असमर्थता जताई। हालांकि थरूर की टीम ने स्पष्ट किया कि यह कोई विरोध नहीं है, बल्कि कार्यक्रमों की टकराहट के कारण वे उपस्थित नहीं हो सके। इसके बावजूद कांग्रेस के भीतर का एक बड़ा धड़ा मानता है कि थरूर लगातार पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से दूरी बना रहे हैं और यह घटना उसी का हिस्सा है। खासकर तब से, जब उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए खड़गे के खिलाफ चुनाव लड़ा था और तब से पार्टी के कुछ गुटों में उन्हें लेकर अलग-अलग मत देखे जाते हैं।
कांग्रेस नेताओं का एक वर्ग यह भी मानता है कि थरूर इस समय ज्यादा स्वतंत्र राजनीतिक रुख अपनाए हुए हैं। पिछले कुछ महीनों में उनके कई सार्वजनिक बयान भी पार्टी लाइन से अलग माने गए। चाहे विदेश नीति पर उनका दृष्टिकोण हो या केंद्र सरकार की कुछ नीतियों पर उनका अपेक्षाकृत संतुलित रुख—थरूर कई बार पार्टी की आधिकारिक भाषा से भिन्न दिखे हैं। इस वजह से नेतृत्व के साथ उनका रिश्ता उतना सहज नहीं माना जा रहा जितना पहले था।
विशेषज्ञ बताते हैं कि कांग्रेस में विचारों की विविधता हमेशा से रही है, लेकिन चुनावी वर्ष में नेतृत्व किसी भी तरह की असहमति को नियंत्रित रखने की कोशिश करता है। राहुल गांधी की बैठक का मकसद भी चुनावी कार्ययोजना को मजबूत करना था। ऐसे में एक प्रमुख नेता की अनुपस्थिति को विपक्ष ही नहीं, मीडिया भी एक संकेत के रूप में देख रहा है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि यह घटना यदि बार-बार होती है तो इसे केवल संयोग नहीं कहा जा सकता।
कांग्रेस ने हालांकि बयान जारी कर कहा है कि थरूर पार्टी के सम्मानित नेता हैं और बैठक का बहिष्कार करने जैसा कोई मामला नहीं है। बयान में कहा गया कि बैठकें विभिन्न स्तरों पर चलती रहती हैं और सभी नेताओं की उपलब्धता हमेशा हर समय संभव नहीं होती। पार्टी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि राहुल गांधी और शशि थरूर के बीच किसी प्रकार का टकराव नहीं है और उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती रहेंगी।
फिर भी, कई राजनीतिक पंडितों के अनुसार, शशि थरूर की कार्यशैली और कांग्रेस की पारंपरिक संरचना के बीच कभी-कभी सामंजस्य की कमी दिखती है। थरूर को हमेशा से एक स्वतंत्र विचारों वाले नेता के रूप में देखा गया है, जो पार्टी में सुधारों और पारदर्शिता की बात करते रहे हैं। उनका यह स्टाइल कई बार मुख्यधारा नेतृत्व के लिए असहज स्थिति पैदा कर देता है। विशेषकर युवा नेतृत्व के उदय और पार्टी में जनाधार बढ़ाने के लिए हो रहे बदलावों के बीच विचारों का यह टकराव और उभरकर नजर आता है।
थरूर और कांग्रेस हाईकमान के संबंधों का दूसरा पहलू यह भी है कि वे राज्य स्तर पर बेहद लोकप्रिय नेता हैं। केरल में उनके समर्थक उन्हें भविष्य का बड़ा चेहरा मानते हैं। ऐसे में थरूर की हर गतिविधि को राजनीतिक अर्थ दिया जाता है। केरल कांग्रेस के कई नेता भी मानते हैं कि थरूर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहते हैं, जिससे पार्टी कई बार असहज हो जाती है, खासकर जब नेतृत्व एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रहा हो।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस को फिलहाल संयुक्त और मजबूत संदेश देने की आवश्यकता है, क्योंकि लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और पार्टी पहले ही कई राज्यों में अंदरूनी बिखराव से जूझ रही है। राजस्थान, पंजाब, हिमाचल और कर्नाटक जैसे राज्यों में पहले ही मतभेद देखने को मिले हैं। ऐसे माहौल में एक वरिष्ठ नेता की अनुपस्थिति का संदेश गलत जा सकता है।
शशि थरूर के कई समर्थक हालांकि मानते हैं कि उनका बैठक में शामिल न होना किसी असहमति का संकेत नहीं, बल्कि केवल कार्यक्रम का क्लैश था। लेकिन उनके आलोचकों के अनुसार यह “सामान्य अनुपस्थिति” नहीं है बल्कि नेतृत्व को एक अप्रत्यक्ष संदेश है कि उन्हें पार्टी में अधिक आवाज और निर्णय लेने की भूमिका चाहिए।
फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व इस मुद्दे को बड़ा बनाने के मूड में नहीं है। पार्टी इस वक्त विपक्षी एकता, चुनावी रणनीति और प्रमुख राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में थरूर की अनुपस्थिति पर ज्यादा चर्चा पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकती है। यही वजह है कि आधिकारिक बयान को संतुलित रखा गया है और विवाद से बचने की कोशिश की गई है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस और शशि थरूर के बीच यह “दूरी” किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है या यह केवल एक सामान्य घटना साबित होगी। यदि आगामी बैठकों, अभियानों या रणनीतिक चर्चाओं में भी थरूर उपस्थित नहीं रहते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत होगा कि कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में कुछ बड़ा brewing है।
