भोपाल:
माध्यप्रदेश में सरकारी वित्तीय कुप्रबंधन एक बार फिर सुर्खियों में है। राज्य का नागरिक आपूर्ति निगम (Civil Supplies Corporation) इस समय देश के सबसे बड़े सरकारी कर्ज बोझ झेलने वाले उपक्रमों में शामिल हो गया है।निगम पर कुल 62,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम कर्ज लदा हुआ है, और इस कर्ज पर वह प्रतिदिन करीब 14 करोड़ रुपये का ब्याज अदा करने को मजबूर है।यह स्थिति न केवल राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य पर सवाल खड़े कर रही है बल्कि सरकारी अनाज खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर भी गहरा असर दिखा रही है।■ इतिहास में पहली बार इतना बड़ा कर्ज बोझअधिकारियों के अनुसार नागरिक आपूर्ति निगम पर इतना बड़ा कर्ज पिछले कई वर्षों में हुई लगातार वित्तीय अनियमितताओं, कुप्रबंधन और समय पर भुगतान न कर पाने की वजह से बढ़ा है।वर्षों से चली आ रही देरी, उधारी पर किए गए भुगतान, बैंक लोन और ब्याज जमा न होने के कारण कर्ज का यह पहाड़ खड़ा हो गया।वित्त विशेषज्ञ कहते हैं कि किसी भी राज्य के सरकारी उपक्रम पर इतना बड़ा बकाया होना यह दर्शाता है कि वित्तीय स्थिति “काफी गंभीर” हो चुकी है।विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तत्काल कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो निगम को दिवालिया जैसी स्थिति से बचाना मुश्किल हो सकता है।■ 14 करोड़ रुपये प्रतिदिन सिर्फ ब्याज — मूलधन तो जस का तससबसे चिंताजनक बात यह है कि नागरिक आपूर्ति निगम प्रतिदिन लगभग 14 करोड़ रुपये केवल ब्याज के रूप में चुका रहा है।इसका मतलब यह है कि जो धनराशि निगम सरकार से अनाज खरीद, भंडारण और परिवहन में खर्च करता है, उसका बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में चला जाता है।वित्त विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया—“निगम का ब्याज बोझ इतना ज्यादा बढ़ चुका है कि उपक्रम की अधिकांश आय ब्याज में ही डूब जाती है। मूलधन में कमी लगभग नहीं के बराबर है।”सरकारी फंड की कमी, भुगतान में देरी और पीडीएस के लिए लिए गए बैंक लोन इस वित्तीय संकट को और गहरा कर रहे हैं।■ अनाज खरीद प्रणाली पर असर — किसानों को भी भुगतना पड़ रहा नुकसानमध्य प्रदेश में रबी और खरीफ की फसल खरीद में नागरिक आपूर्ति निगम की मुख्य भूमिका रहती है।लेकिन बढ़ते वित्तीय संकट के कारण कई बार भुगतान में देरी की शिकायतें सामने आती रहती हैं।कई जिलों में किसान बताते हैं कि अनाज जमा कराने के बाद भुगतान 30 से 90 दिनों तक फंस जाता है।ऐसी स्थितियों में किसान निजी व्यापारियों की ओर रुख करते हैं, जिससे उन्हें सरकारी समर्थन मूल्य से भी कम कीमत पर अनाज बेचना पड़ता है।एक किसान नेता ने बताया—“अगर निगम की हालत ऐसी ही रही, तो किसानों की सरकारी खरीद पर भरोसा धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। भुगतान में देरी किसान की सबसे बड़ी चिंता है।”■ स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट और पीडीएस वितरण पर भी प्रभावनागरिक आपूर्ति निगम न केवल अनाज की खरीद करता है बल्कि गोदामों में भंडारण, मिलों तक ट्रांसपोर्ट और राशन दुकानों में वितरण की जिम्मेदारी भी निभाता है।लेकिन वित्तीय संकट के कारण इन कार्यों में भी पिछड़ापन देखा जा रहा है।• कई जिलों में गोदाम किराए का भुगतान अटका• ट्रांसपोर्टरों के भुगतान में महीनों की देरी• राशन वितरण की समयसीमा में बदलाव• मेंटेनेंस और रिकॉर्डिंग कार्यों में ढीलपरिणामस्वरूप पीडीएस प्रणाली की रफ्तार कई जगह धीमी हो गई है।■ राजनीतिक आरोप–प्रत्यारोप तेजनिगम की वित्तीय स्थिति सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी तेज हैं।विपक्ष ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि “निगम को योजनाबद्ध तरीके से कर्ज के जाल में धकेला गया है।”वहीं, सरकार का कहना है कि पिछली नीतियों के कारण यह स्थिति बनी है और मौजूदा समय में सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं।सरकार ने संकेत दिए हैं कि कर्ज पुनर्गठन (Debt Restructuring), अनियमितताओं की जांच और वितरण सुधार जैसे कदम जल्द लागू किए जा सकते हैं।■ क्या निगम दिवालिया होने की कगार पर? विशेषज्ञों की चेतावनीआर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि 62 हजार करोड़ का कर्ज किसी सामान्य सरकारी इकाई के लिए असाधारण है।अगर ब्याज भुगतान इसी गति से चलता रहा, तो कुछ ही वर्षों में निगम संचालन लागत भी वहन करने में असमर्थ हो सकता है।राज्य की वित्तीय स्थिति पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ बताते हैं—“अगर तत्काल पारदर्शी ऑडिट, खर्चों में कटौती और कर्ज पुनर्गठन नहीं हुआ, तो निगम पर ताला लगने तक की स्थिति बन सकती है।”■ सरकार समाधान की ओर, लेकिन रास्ता कठिनसरकारी सूत्रों ने बताया है कि निगम के वित्तीय ढांचे को सुधारने के लिए कुछ बड़े फैसलों की तैयारी है —कर्ज के पुनर्गठन की योजनाब्याज दरों में कमी के लिए बैंकों से बातचीतफंड रिलीज की प्रक्रिया तेज करने के निर्देशअनाज खरीद की प्रक्रिया में पारदर्शिताबकाया भुगतान को चरणबद्ध तरीके से निपटाने की तैयारीहालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े कर्ज से निकलना आसान नहीं होगा।■ आम जनता और पीडीएस उपभोक्ताओं पर असरअगर स्थिति बदतर होती गई तो इसका सीधा प्रभाव राशन कार्डधारकों पर भी पड़ सकता है।अनाज वितरण में देरी, राशन दुकानों पर असमान्य स्टॉक और परिवहन में बाधाएँ बढ़ सकती हैं।
