भोपाल:
मध्यप्रदेश के मेडिकल शिक्षा तंत्र की गंभीर खामियां एक बार फिर उजागर हुई हैं। प्रदेश के 19 मेडिकल कॉलेजों में से 7 कॉलेज ऐसे हैं, जहाँ न पर्याप्त फैकल्टी है और न ही जरूरी लैब व प्रैक्टिकल सुविधाएँ। नतीजा यह कि एमबीबीएस के स्टूडेंट प्रैक्टिकल ज्ञान की जगह ऑनलाइन वीडियो और नोट्स पर ही निर्भर होकर पढ़ाई कर रहे हैं। इससे “हाफ डॉक्टर” तैयार होने का खतरा बढ़ रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डॉक्टर बनने की सबसे बड़ी नींव क्लिनिकल प्रैक्टिस और लैब वर्क है। लेकिन कई कॉलेजों में न एनाटॉमी लैब की पूरी सुविधा है, न फिजियोलॉजी, न बायोकैमिस्ट्री, और न ही हाई-एंड डायग्नॉस्टिक सेटअप।
कहाँ है सबसे ज्यादा समस्या?
जांच रिपोर्ट के अनुसार—
7 मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी 40% से भी कम
कई जगह डमी हाजिरी और अस्थायी गेस्ट फैकल्टी पर निर्भरता
प्रैक्टिकल लैब्स में उपकरण अधूरे या बंद
हॉस्पिटल अटैचमेंट में मरीजों की संख्या कम, जिससे क्लिनिकल एक्सपोजर घटा
स्टूडेंट्स ने बताया कि उन्हें परीक्षा की तैयारी के लिए इंटरनेट, यू-ट्यूब और पीडीएफ मैटेरियल पर ही निर्भर होना पड़ रहा है। एक छात्र ने कहा—
“लैब में उपकरण नहीं, टीचर समय पर नहीं… मजबूरी में ऑनलाइन पढ़ना पड़ता है। डॉक्टर बनेंगे कैसे—यही डर है।”
सरकार की प्रतिक्रिया
मेडिकल शिक्षा विभाग ने कहा है कि फैकल्टी की नियुक्तियों के लिए नई प्रक्रिया शुरू की जा रही है और इन्फ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने के लिए फंड स्वीकृत किए गए हैं। हालांकि कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि सुधार जल्द नहीं हुए, तो प्रदेश की मेडिकल क्वालिटी सीधे खतरे में आ जाएगी।
क्यों चिंताजनक है स्थिति?
प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के बिना डॉक्टर गलत निर्णय ले सकते हैं
ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से डॉक्टरों की भारी कमी
खराब ट्रेनिंग के कारण स्वास्थ्य व्यवस्था पर सीधा असर
राज्य में मेडिकल कॉलेजों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन गुणवत्ता में गिरावट ने इसे गंभीर मुद्दा बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या का जड़ कारण है—तेजी से विस्तार, लेकिन संसाधनों और फैकल्टी की कमी।
