March 24, 2026
Mental Health: छोटे शहर में टॉपर बेटा, बड़े शहर में एवरेज बन गया; अब उदास रहता है, माता-पिता क्या करें?
लाइफस्टाइल

Mental Health: छोटे शहर में टॉपर बेटा, बड़े शहर में एवरेज बन गया; अब उदास रहता है, माता-पिता क्या करें?

Nov 7, 2025

भोपाल।

Mental Health: छोटे शहरों से बड़े शहरों के कॉलेजों में पढ़ाई करने जाने वाले कई बच्चों को अचानक “सफलता से गिरने का डर” सताने लगता है।
कभी क्लास का टॉपर रहा बच्चा जब नए माहौल में औसत (average) हो जाता है, तो उसका आत्मविश्वास डगमगा जाता है।
ऐसी स्थिति में अभिभावकों को यह समझना जरूरी है कि यह असफलता नहीं, बल्कि जीवन के नए चरण की मानसिक परीक्षा है।


हर बच्चा हर माहौल में समान प्रदर्शन नहीं कर सकता

साइकोलॉजिस्ट्स के अनुसार, छोटे शहरों के टॉपर स्टूडेंट्स का आत्मविश्वास अपने स्कूल और माहौल के अनुसार बना होता है।
जब वे बड़े शहर के कॉलेजों में आते हैं, जहां कंपीटिशन, भाषा, एक्सपोजर और माहौल अलग होता है, तो उन्हें खुद को उसी लेवल पर एडजस्ट करने में समय लगता है।
कई बार इसी वजह से बच्चा खुद को ‘कमतर’ या ‘असफल’ समझने लगता है।


एक्सपर्ट की राय

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. नेहा चौहान कहती हैं —

“बच्चे को यह महसूस कराना जरूरी है कि उसकी पहचान सिर्फ अंकों या रैंक से नहीं जुड़ी है।
जब वह नए माहौल में जाता है, तो उसे दूसरों से नहीं, खुद से तुलना करनी चाहिए।”

वे कहती हैं कि ऐसे बच्चों को मोटिवेशन, भरोसा और भावनात्मक सपोर्ट की जरूरत होती है, न कि बार-बार तुलना की।


माता-पिता कैसे समझाएं?

  1. तुलना न करें: “पहले टॉपर था, अब क्या हो गया?” जैसे वाक्य स्थिति को और बिगाड़ते हैं।
  2. धैर्य रखें: उसे खुद को नए माहौल में ढालने का समय दें।
  3. सुनें, टोकें नहीं: बच्चे की बात बीच में काटने से वह और अंदर सिमट जाता है।
  4. प्रोत्साहित करें: उसकी छोटी-छोटी उपलब्धियों को पहचानें और सराहें।
  5. जरूरत हो तो प्रोफेशनल मदद लें: लगातार उदासी, नींद की कमी या रुचि खत्म होना डिप्रेशन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।

भावनात्मक स्थिरता भी एक स्किल है

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि “इमोशनल स्ट्रेंथ” भी एक स्किल की तरह सीखी जा सकती है।
बच्चे को यह सिखाएं कि हर स्थिति में स्थिर रहना, हार को स्वीकारना और फिर से उठ खड़ा होना ही असली सफलता है।


कहानी जैसी हजारों वास्तविकताएं

आज के समय में हजारों ऐसे छात्र हैं जो छोटे शहरों के टॉपर होकर बड़े शहरों में औसत बन जाने की मानसिक लड़ाई लड़ रहे हैं।
जरूरत है समाज और परिवार को यह समझने की कि हर बच्चे की यात्रा अलग होती है — और हर मंज़िल का अपना समय होता है।