पटना।
Record Voting: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 64.4% वोटिंग हुई है। यह आंकड़ा राज्य के पिछले तीन चुनावों से कहीं अधिक है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इतनी बड़ी वोटिंग आमतौर पर सत्ता परिवर्तन का संकेत मानी जाती है, लेकिन इस बार समीकरण थोड़ा उल्टा हो सकता है।
विश्लेषण बताते हैं कि बिहार में जब-जब 5% से ज्यादा वोटिंग बढ़ी है, तब-तब सत्ता बदली है। हालांकि, इस बार के रुझान बताते हैं कि नीतीश कुमार के लिए समीकरण पहले जितना आसान नहीं है, लेकिन उन्हें पूरी तरह हटाना भी मुश्किल दिख रहा है।
17 चुनावों का एनालिसिस: वोट बढ़े तो सरकार बदली
पिछले 17 विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह पैटर्न साफ दिखता है कि
- जब भी मतदान में 5% या उससे अधिक की वृद्धि हुई है,
- सत्ता परिवर्तन हुआ है।
उदाहरण के तौर पर —
- 1990 में वोटिंग बढ़ी, लालू यादव सत्ता में आए।
- 2005 में वोटिंग में उछाल आया, नीतीश कुमार ने राजद से सत्ता छीनी।
- 2015 में वोटिंग बढ़ी तो महागठबंधन बना।
- 2020 में गिरावट आई, लेकिन एनडीए किसी तरह टिक गया।
इस बार 64.4% का रिकॉर्ड मतदान इस बात का संकेत है कि जनता बदलाव को लेकर उत्साहित है, पर दिशा किस ओर जाएगी, ये कहना अभी जल्दबाजी होगा।
ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की वोटिंग सबसे ज्यादा
इस चरण में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही।
गांवों में लंबी कतारें देखने को मिलीं। आयोग के अनुसार, कई जिलों में महिला वोटिंग प्रतिशत 70% से ऊपर रहा।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि महिलाएं अब बिहार की राजनीति का ‘साइलेंट फैक्टर’ बन चुकी हैं।
किसके पक्ष में गया भारी मतदान?
एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों ही उच्च मतदान को अपने पक्ष में बता रहे हैं।
जेडीयू का कहना है कि जनता ने स्थिरता और विकास के लिए वोट किया,
जबकि आरजेडी का दावा है कि बदलाव की लहर है और लोगों ने बेरोजगारी व महंगाई के खिलाफ मतदान किया।
दूसरे चरण पर टिकी सबकी नजर
पहले चरण में मतदान शांति से संपन्न हुआ, अब सभी की नजर दूसरे चरण पर है।
अगर अगले चरणों में भी इसी तरह उत्साह बना रहा तो बिहार में बड़ा राजनीतिक उलटफेर संभव है।
